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Thursday, October 30, 2008

कर्मचारी आर्थिक मंदी की मार से इतने चिंतित, परेशान कि ठीक से सो नहीं पाते

अमेरिका में आर्थिक मंदी ने लोगों की नींद हराम कर दी है और वे रात को चैन से सो भी नहीं पा रहे हैं। कर्मियों के कल्याण से जुड़ी एक संस्था Marketing to Moms Coalition ने अपने सर्वेक्षण के आधार पर कहा है कि अमेरिका के 92 प्रतिशत कर्मचारी आर्थिक मंदी की मार से इतने चिंतित और परेशान हैं कि रात में ठीक से सो भी नहीं पाते जिसका असर काम पर भी पड़ रहा है। कार्यालय में सुबह आते ही लोगों ताजा और प्रसन्नचित नजर नहीं आते।

अध्ययन के अनुसार एक तिहाई कर्मचारी महंगाई की मार से त्रस्त हैं तो अन्य एक तिहाई कर्जो की मार से बेहाल हैं। हर छह कर्मचारियों में से एक का कहना है कि वह बंधक रखी गई संपत्ति के लिए चिंतित है तो दूसरों का कहना है कि वे रिटायरमेंट के बाद के जीवन को लेकर चिंतित हैं। आठ प्रतिशत कर्मचारियों ने कहा है कि वे आर्थिक मंदी के असर से अछूते हैं।

मूल समाचार

... they are probably losing sleep over the global financial crisis, according to research released ...

Ninety-two percent of respondents said the economic turmoil is keeping them awake at night, according to a survey ...

Of those, a third said their biggest worry was the cost of living, while another third cited their credit card debt.

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Friday, August 15, 2008

महंगाई ने 17 साल का रिकॉर्ड तोड़ा, अमेरिका में

खाद्य पदार्थ, ऊर्जा आदि की कीमतें बढ़ जाने के कारण, महंगाई ने अमेरिका में पिछले १७ साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। थोक मूल्य सूचकांक 0.8 प्रतिशत बढ़ गया है।

मूल समाचार

US inflation has soared to a 17-year-high annual rate in July, led by prices rises in food, energy, airline fares and apparel।

The consumer price index rose 0।8 per cent in July, the Labour Department said. That came on the heels of June's 1.1 per cent rise, which was the second largest since June 1982.


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Monday, July 21, 2008

हमारी महंगाई भी कोई महंगाई है लल्लू?

बढ़ती महंगाई से निजात पाने के लिए जिंबाब्वे का केंद्रीय बैंक सोमवार को १०० अरब डालर का नोट जारी करने जा रहा है। वर्तमान में यहां ५० अरब डॉलर का सबसे बड़ा नोट प्रचलन में है। जिंबाब्बे की मुद्रा भी डॉलर है। सरकारी तौर पर यहां के ३० हजार डॉलर एक अमेरिकी डॉलर के बराबर होते हैं। वैसे एक अमेरिकी डालर लेने के लिए यहां के निवासियों को अपने ८० करोड़ डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।

कभी समृद्ध अर्थंव्यवस्थाऒं में गिने जाने वाला अफ्रीकी देश जिंबाब्वे की हालत बीते कुछ सालों से बेहद खराब है। इसके चलते यहां मांस, मक्का, ईधन और अन्य आवश्यक वस्तुऒं की भारी किल्लत है। मुद्रास्फीति की दर यहां २२ लाख फीसदी के ऊपर पहुंच चुकी है। जिंबाब्वे की सेंट्रल बैंक के गवर्नर गिडेन गोनो ने बताया कि इसको देखते हुए १०० अरब डालर का नोट जारी किया जा रहा है। इस नोट के जारी होने से यहां के निवासियों को साधारण खरीदारी के लिए नोटों की गडि्डयां ले जाने के झंझट से निजात मिलेगी। सही मायनों में आसमान पर पहुंची महंगाई के कारण जिंबाब्वे के निवासियों को साधारण टैक्सी के किराए के रूप में भी लाखों डालर का भुगतान करना पड़ता है। इसके लिए वह बैग में नोटों की गडि्डयां भरकर ले जाते हैं।

गोनो ने बताया कि वह बैंकों से रकम निकासी की सीमा बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। फिलहाल इसके लिए १०० अरब डालर की सीमा निर्धारित है। इसके जरिए केवल एक शहर के भीतर बस से दो बार यात्रा की जा सकती है अथवा दो पाव रोटी खरीदी जा सकती हैं। इतनी बड़ी रकम जेब में डालकर बाजारों में घूमने के बदले में जरूरी नहीं कि पाव रोटी मिल ही जाए। खाने-पीने के सामान ढूंढने में काफी वक्त जाया करने वाले जिंबाब्वेवासी धन की निकासी के लिए बैंकों के बाहर भी घंटों कतारबद्ध देखे जा सकते हैं।

इस पोस्ट के लिखे जाते समय १०० अरब जिम्बाब्वे डॉलर की कीमत भारतीय रूपयों में 228.79 रूपये थी।
इस सम्बन्ध में जिम्बाब्वे रिज़र्व बैंक गवर्नर का घोषणापत्र देखिये।